2। वार्ड्स कैसल में आगमन
लिली का नज़रिया
जैसे ही हम मिस्टर वॉर्ड की हवेली के करीब पहुँचे, कार एक बिल्कुल साफ़-सुथरी पत्थरों वाली सड़क पर फिसलती हुई आगे बढ़ी, और मुझे पहली बार उस शानदार घर की झलक मिली जो विक्टोरियन दौर के किसी किले जैसा दिख रहा था। साफ़ था कि मेरे नए मालिक की दौलत किसी गहरी जड़ें जमाए हुए ख़ानदानी विरासत से आई थी।
मैं सोचने से खुद को रोक नहीं सकी कि अगर मैं भी किसी रईस घर में पैदा हुई होती, किसी ऐसे किले में जहाँ हर चीज़ हाथ के इशारे पर मिल जाती, तो मेरी ज़िंदगी कैसी होती। शायद मैं यहाँ यॉर्क में न होती; शायद लंदन में होती, उन नफ़ीस, अमीर घरों की औरतों की तरह रहती जिन्हें मैं कभी-कभी शहर के बीचोंबीच देख लिया करती थी। लेकिन मेरी कहानी वैसी नहीं थी। मैं कोई राजकुमारी नहीं थी—बस एक साधारण लड़की, वो भी अनाथ।
हम यॉर्क में रहते थे, जो यॉर्कशायर का एक प्यारा-सा शहर है, उत्तरी इंग्लैंड में बसा हुआ। छोटा तो नहीं था, पर उसमें एक सुकून भरा माहौल था, और उसकी पचानवे प्रतिशत इमारतें वाइकिंग और विक्टोरियन दौर की याद दिलाती थीं। यॉर्क में एक अजीब-सी शांति थी—लोग मिलनसार थे, और अनगिनत सैलानी उसके उत्तरी यूरोपीय आकर्षण से खिंचे चले आते थे।
ये जगह उन लोगों के लिए बिल्कुल ठीक थी जिनके पास स्थिर आमदनी और मजबूत पारिवारिक जड़ें हों—और मेरे पास दोनों में से कुछ भी नहीं था। मैंने अपने माता-पिता को कभी नहीं देखा। मुझे बताया गया था कि एक रात किसी ने मुझे टोकरी में छोड़कर सेंट लॉरेंट अनाथालय के दरवाज़े पर रख दिया था, और वहीं से उन्होंने मुझे उठाकर पाला-पोसा।
मैं अपने परिवार को लेकर जिज्ञासु तो थी—मेरे माता-पिता कौन थे, मैं कहाँ से आई थी। लेकिन साथ ही मुझे इस बात का डर भी था कि कहीं सच जानकर मैं और टूट न जाऊँ। इसलिए मैंने वही ज़िंदगी स्वीकार कर ली जो मेरे सामने थी, और ठान लिया कि जो भी है, उसे जितना हो सके सलीके से निभाऊँगी।
“मैं तुम्हें बहुत याद करूँगी,” एलेन ने कहा—वो अनाथालय की देखभाल करने वाली में से एक थी और मेरी सबसे प्यारी दोस्तों में से भी। जैसे ही मैं अनाथालय में अपना छोटा-सा सूटकेस पैक कर रही थी, उसने मुझे बाँहों में भर लिया। तब तक मुझे पता था कि मेरा नया मालिक बाहर इंतज़ार कर रहा होगा, शायद अधीर भी हो रहा होगा, जबकि मदर सुपीरियर उस पर जान छिड़क रही होंगी।
क्या वो झुंझला रहा होगा, जल्दी निकल जाना चाहता होगा? मैंने सुना था कि अमीर लोग ग़रीबी वाली जगहों पर ज़्यादा देर रुकना पसंद नहीं करते। फिर भी, मैंने एलेन को हल्की मुस्कान के साथ गले लगाया। वो बहुत नेक दिल थी, हमेशा मेरा साथ देने वाली, मेरे पास खड़ी रहने वाली। हम सच्ची सहेलियाँ थे।
“चिंता मत करो, मैं कहीं दूर थोड़ी जा रही हूँ। मैं बीच-बीच में यहाँ आती रहूँगी, और छुट्टी के दिन हम शहर के बीच में मिल सकते हैं,” मैंने उसके पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, उसे तसल्ली देने की कोशिश की। मैं उसकी दोस्ती किसी भी हाल में नहीं खोना चाहती थी। वो हल्के से हँसी और मेरे कंधे पर मज़ाकिया अंदाज़ में हल्का-सा धप्पा मारा।
“तुम्हें क्या लगता है, ये छोटा साहब तुम्हें कभी छुट्टी लेने देगा?” उसने नज़र घुमाकर बेबी आर्थर की तरफ़ इशारा किया, जो मेरी मामूली-सी खाट पर लेटा हुआ अपनी गोल-मटोल टाँगें हवा में खुशी से मार रहा था। पाँच महीने की उम्र में ही वो ऊर्जा का एक छोटा-सा गोला था।
“मैं उसे भी साथ ले आऊँगी,” मैंने बिना सोचे-समझे जवाब दिया, और एलेन ने ज़बान से चुटकी लेते हुए सिर हिलाया।
“तुम्हारा तो इस बच्चे से ऐसा लगाव है, जैसे ये तुम्हारा अपना हो।” वो ग़लत नहीं कह रही थी, लेकिन मुझे सच में सौभाग्यशाली महसूस होता था कि मुझे आर्थर जैसे मासूम बच्चे पर अपना प्यार लुटाने का मौका मिला है। “मुझे नहीं पता उसके पिता के साथ तुम्हारा कैसा गुज़रेगा—सब जानते हैं वो कितना घमंडी है। हो सकता है वो तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार न करे, पर मैं दुआ करती हूँ कि सब ठीक रहे।” ये कहते हुए उसने मुझे फिर से गले लगा लिया। मैं भी यही चाहती थी। आख़िर मैं वहाँ मिस्टर वॉर्ड के लिए नहीं जा रही थी—मैं तो आर्थर के लिए जा रही थी।
और अब, मैं यहाँ थी, वॉर्ड के क़िले के सामने खड़ी, जिसकी भारी-भरकम लोहे की फाटक उस हवेली की रखवाली कर रही थी। फाटक खुला तो मिस्टर वॉर्ड की गाड़ी अंदर चली गई, और घर के सामने दूर तक फैला हुआ, बारीकी से सँवारा गया बाग़ नज़र आने लगा।
बाग़ बहुत विशाल था—घनी, तराशी हुई घास और करीने से कटे हुए झाड़ियाँ। यक़ीनन मिस्टर वॉर्ड ने इतने बेदाग़ सौंदर्य के लिए मालीयों की एक पूरी टीम रखी होगी। गाड़ी जब फाटक के अंदर पत्थरों वाली पगडंडी पर आगे बढ़ी, तो मैंने देखा कि क़िले की साइड की दीवारों पर बेलें चढ़ी हुई थीं, जो उसे एक साथ सख़्त और हरा-भरा सा आकर्षण दे रही थीं।
गाड़ी घर के सामने इधर-उधर खड़ी कुछ और गाड़ियों के बीच आकर रुकी, और ड्राइवर अपने मालिक के लिए दरवाज़ा खोलने बाहर उतरा। तब तक मैं अपने सीने को ढक चुकी थी—आर्थर दूध पीकर अब मेरी बाँहों में सुस्ताने लगा था—तो मेरे मालिक की तीखी निगाहें, कम से कम अभी के लिए, ठंडी पड़ गई थीं।
लेकिन जैसे ही वह गाड़ी से उतरे, मैंने अपनी तरफ़ का दरवाज़ा खोलकर बाहर आने के लिए, बच्चे को थोड़ा सँभालकर अपनी बाँहों में इधर-उधर किया। इससे पहले कि मैं कुछ कर पाती, मिस्टर वॉर्ड ने मुझसे पहले ही मेरा दरवाज़ा खींचकर खोल दिया। मैं हैरानी से पलकें झपकाती हुई ऊपर उस लंबे आदमी को देखने लगी, जिसने अभी-अभी इतना अप्रत्याशित काम कर दिया था। इसका मतलब क्या था? वह मेरे लिए गाड़ी का दरवाज़ा खोलने की ज़हमत क्यों उठा रहे थे?
वह मेरे मालिक थे—मेरे लिए यूँ क्यों अतिरिक्त मेहनत करते? हो सकता है वह बस एक सलीकेदार, तहज़ीबदार सज्जन हों, जिन्हें बुनियादी शिष्टाचार आता हो, जैसे औरत के लिए दरवाज़ा खोलना, लेकिन मेरे लिए तो ऐसा करना उनका कोई फ़र्ज़ नहीं था—मैं तो बस एक नौकरानी थी। फिर भी, वह वहीं खड़े थे, मेरा दरवाज़ा खोले हुए। यह छोटा-सा काम, और उसके साथ जिस तरह वह मुझे अपने बच्चे को दूध पिलाते हुए देख रहे थे, दोनों बातों ने मुझे पूरी तरह उलझा दिया था। मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि इसे कैसे लूँ।
“जल्दी बाहर निकलो, और ध्यान रखना, मेरे बेटे का सिर गाड़ी से न टकरा देना,” वह झल्लाकर बोले, उनकी आवाज़ कड़क और चुभती हुई थी। मैंने सिर झुका लिया, गाल शर्म से गर्म हो उठे। एक पल को मुझे लगा था कि वह मेरे प्रति कुछ अजीब-सा नरम व्यवहार कर रहे हैं, पर नहीं—उन्हें तो बस अपने बच्चे की चिंता थी। “बेवकूफ़! तेरा मालिक तेरे लिए दरवाज़ा क्यों खोलेगा, लिली?” मैंने खुद को मन ही मन डाँटा, और आर्थर को बाँहों में सँभाले गाड़ी से उतर आई।
शाम की हवा ठंडी थी, और घर के कई नौकर-चाकर अपने-अपने काम में व्यस्त इधर-उधर घूम रहे थे। मेरी तरफ़ आती एक उम्रदराज़ औरत को मैंने शिष्टता से सिर हिलाकर नमस्ते की। उसने सफ़ाई वाले कपड़े पहन रखे थे और चेहरे पर थकान झलक रही थी, लेकिन उसने न मेरी मुस्कान लौटाई, न इशारा। क्या मैंने किसी तरह उसे नाराज़ कर दिया था?
“इसका सूटकेस डिक्की से निकालो और नैनी के कमरे में रख दो। अब से यह आर्थर की नई नैनी होगी,” मिस्टर वॉर्ड ने उस औरत को हुक्म दिया। वह एक पल को चौंककर आँखें फैलाए खड़ी रह गई, फिर सिर हिलाकर अपने मालिक की बात मानने लगी।
“तुम, मेरे साथ चलो,” उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा और रास्ता दिखाते हुए आगे बढ़े।
“जी साहब… ठीक है…” मैंने घबराहट में सिर हिलाया और उनके पीछे-पीछे चल पड़ी, ध्यान रखते हुए कि कहीं इस भव्य सीढ़ी पर पैर फिसल न जाए। जैसे ही मैं क़िले के अंदर क़दम रखी, दिल के किसी कोने में डूबता हुआ-सा एहसास हुआ—यहाँ की ज़िंदगी वैसी सुखद नहीं होने वाली थी, जैसी मैंने सपने में सोची थी।
